इंसाफ की गुहार
इंसाफ की उम्मीद
में जंतर-मंतर पर पूरे साल व्यक्तिगत या सामूहिक धरना-प्रदर्शन होते रहते हैं। नई
दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित ऐतिहासिक जंतर-मंतर मौजूदा समय में धरना-प्रदर्शनों का
पर्याय बन चुका है। इस इमारत के पास हर दिन, हर समय लोग धरने पर बैठे रहते हैं। उनका मानना होता है कि यहां बोलने से सरकार उनकी बात
सुन लेगी। वैसे जंतर-मंतर पर धरना का मतलब संसद पर धरना देना ही है। संसद की
सुरक्षा में कोई व्यवधान न आए इसलिए सरकार ने आंदोलनकारियों और संगठनों को
जंतर-मंतर पर बैठने की अनुमति दे रखी है।
यूं तो जंतर पर
सालों भर प्रदर्शन होते रहते हैं। परंतु संसद सत्र के दौरान इनकी संख्या
अपेक्षाकृत अधिक होती है। चुनावी मौसम ना हो तो सरकार की नजर में इन धरनों की कुछ हैसियत
नहीं होती है। थोड़ी-बहुत खोज-खबर ले तो पता चलता है कि उन्हें खानापूर्ति वाला आश्वासन
दे दिया जाता है। यहां बैठे लोगों का बड़ा सहारा मीडिया होता होता है। पर बड़े
व्यवसायिक घराने और सरकारी दखल के कारण मीडिया की स्थिति भी अच्छी नहीं है। पीटीआई
के एकाधिकार को तोड़ने के लिए कुछ बड़े अखबारी घराने ने समाचार एजेंसी यूनीवार्ता
की स्थापना करवाई थी। आज लगभग पांच दशक बाद यह एजेंसी बंदी के कगार पर है और इसके
कर्मचारियों को पिछले दस-ग्यारह महीनो से वेतन नहीं मिल रहा है। इसके कर्मचारी ‘यूएनआई बचाओ’ आंदोलन चला रहे
हैं। मानसून सत्र के आखिरी दिन वो भी जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन करने पहुंचे। इस
आंदोलन के कोर कमीटी के सदस्य उपेंद्र नाथ मिश्रा का कहना है कि यूनिवार्ता
संस्थान की स्थिति बेहद खराब हो गई है। इसके पूर्व अध्यक्ष प्रफ्पुल माहेश्वरी की
आपराधिक और भू-माफियों को फायदा पहुंचाने के लिए काम कर रहे थे। वो इस संस्थान की
जमीन बिल्डरों के हवाले कर करोड़ों रुपए अर्जित करना चाहते थे। उन्हीं की पहल पर
विश्वनाथ त्रिपाठी को यूएनआई का सदस्य नामित किया गया। और माहेश्वरी के बाद
त्रिपाठी संस्था के सर्वेसर्वा बन गए। इन लोगों ने थ्रिफ्ट सोसाइटी के करीब तीन
करोड़ रुपए डकार रखे हैं। ‘यूएनआई बचाओ’ के कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे
को पत्र लिख मामले की सीबीआई जांच करवाने एवं संस्था को आर्थिक सहायता उपलब्ध
कराने की मांग की है। इस संस्थान में बड़ी संख्या में कर्मचारियों की छटनी हो रही
है।
जंतर-मंतर पर देश के कोने-कोने से आए लोग आते हैं। उनकी मांगे अलग-अलग होती हैं। कुछ लोग तो यहां सालों से बैठे हुए हैं। इनमें से एक हैं डॉ. रमा इंद्र। रमा इंद्र कहते हैं कि वो 1997 से अलग-अलग मुद्दों पर भूख हड़ताल कर रहे हैं। शुरूआती दिनों में तो उन्होंने लगातार भूख हड़ताल किया था लेकिन अब वो 24 घंटे या फिर 48 घंटे बाद रात को हल्का खा-पी लेते हैं। इनकी मांग हैं कि सामाजिक असमानता का दूर किया जाए। सबको बराबर अवसर दिया जाएं और पूंजीवाद खत्म किया जाए। साथ ही वो तिब्बत की आजादी का भी समर्थन करते हैं। वो कहते हैं कि जंतर-मंतर पर उन्हें चैन से बैठने भी नहीं दिया जाता। सरकार के मंत्री और पुलिस उन्हें मारने की कोशिश करते हैं। इस बाबत जब जंतर-मंतर चौकी के सब-इंस्पेक्टर इस्माईल खान कहते हैं डॉ. रमा इंद्र के पास जंतर-मंतर पर बैठने की अनुमति नहीं है। बिना इजाजत, वो बैठने की जिद्द करते हैं। जिसके लिए उन्हें सख्त रूख अपनाना पड़ता है।
जंतर-मंतर पर देश के कोने-कोने से आए लोग आते हैं। उनकी मांगे अलग-अलग होती हैं। कुछ लोग तो यहां सालों से बैठे हुए हैं। इनमें से एक हैं डॉ. रमा इंद्र। रमा इंद्र कहते हैं कि वो 1997 से अलग-अलग मुद्दों पर भूख हड़ताल कर रहे हैं। शुरूआती दिनों में तो उन्होंने लगातार भूख हड़ताल किया था लेकिन अब वो 24 घंटे या फिर 48 घंटे बाद रात को हल्का खा-पी लेते हैं। इनकी मांग हैं कि सामाजिक असमानता का दूर किया जाए। सबको बराबर अवसर दिया जाएं और पूंजीवाद खत्म किया जाए। साथ ही वो तिब्बत की आजादी का भी समर्थन करते हैं। वो कहते हैं कि जंतर-मंतर पर उन्हें चैन से बैठने भी नहीं दिया जाता। सरकार के मंत्री और पुलिस उन्हें मारने की कोशिश करते हैं। इस बाबत जब जंतर-मंतर चौकी के सब-इंस्पेक्टर इस्माईल खान कहते हैं डॉ. रमा इंद्र के पास जंतर-मंतर पर बैठने की अनुमति नहीं है। बिना इजाजत, वो बैठने की जिद्द करते हैं। जिसके लिए उन्हें सख्त रूख अपनाना पड़ता है।
जंतर-मंतर पर
दो-चार आगे-पीछे होने से ही धरने का स्वरुप और धरने पर बैठे लोग बदल जाते हैं।
किसी की रोजी-रोटी समस्या है तो कोई शोषण के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करता दिखाता
है। लेकिन इस पखवाड़े जंतर-मंतर पर एक नाबालिक युवती के बलात्कार के आरोप में जेल
में बंद धर्म गुरु आसाराम के समर्थक बी बड़ी संख्या में धरने पर बैठे थे। उनके
समर्थकों में महिलाओं की संख्या ज्यादा थी। वो अपने गुरु को झूठे आरोप में फंसाने
की साजिश का विरोध कर रहे थे। आसाराम पर इतने बड़े आरोप लगने और पुख्ता सबूत होने
के बावजूद उनके समर्थक अभी भी उनपर विश्वास कर रहे हैं। इसे देखकर लगता है कि
हमारे लोग आज भी आंखें मुदें भरोसा करते हैं।
खैर, जंतर-मंतर पर
धरने की इजाजत सुबह दस से शाम पांच बजे तक की रहती है। पुलिस इनके सिर्फ पीने के
पानी उपलब्ध करवाती है। यहां धरने पर बैठे लोग पास के दुकानों से हल्का-फुल्का
खाना खरीदकर खाते है। कुछ लोग पास के मंदिर या गुरुद्वारे में जाकर लंगर में खाना
खाते हैं और रात को, वहीं आसमान के नीचे, सड़क पर सोते हैं।
Comments
Post a Comment