इंसाफ की गुहार
इंसाफ की उम्मीद में जंतर-मंतर पर पूरे साल व्यक्तिगत या सामूहिक धरना-प्रदर्शन होते रहते हैं। नई दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित ऐतिहासिक जंतर-मंतर मौजूदा समय में धरना-प्रदर्शनों का पर्याय बन चुका है। इस इमारत के पास हर दिन, हर समय लोग धरने पर बैठे रहते हैं। उनका मानना होता है कि यहां बोलने से सरकार उनकी बात सुन लेगी। वैसे जंतर-मंतर पर धरना का मतलब संसद पर धरना देना ही है। संसद की सुरक्षा में कोई व्यवधान न आए इसलिए सरकार ने आंदोलनकारियों और संगठनों को जंतर-मंतर पर बैठने की अनुमति दे रखी है। यूं तो जंतर पर सालों भर प्रदर्शन होते रहते हैं। परंतु संसद सत्र के दौरान इनकी संख्या अपेक्षाकृत अधिक होती है। चुनावी मौसम ना हो तो सरकार की नजर में इन धरनों की कुछ हैसियत नहीं होती है। थोड़ी-बहुत खोज-खबर ले तो पता चलता है कि उन्हें खानापूर्ति वाला आश्वासन दे दिया जाता है। यहां बैठे लोगों का बड़ा सहारा मीडिया होता होता है। पर बड़े व्यवसायिक घराने और सरकारी दखल के कारण मीडिया की स्थिति भी अच्छी नहीं है। पीटीआई के एकाधिकार को तोड़ने के लिए कुछ बड़े अखबारी घराने ने समाचार एजेंसी यूनीवार्ता की स्थ...