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Showing posts from 2014

गृहिणी: सबसे बड़ा सम्मान

" उड़ान तो वो है जो पंखों की मोहताज नहीं होती ,  मंच , श्रोता , शोहरत की तलबगार नहीं होती तैरना तक सिखा देती है लहरे ,  डूबतें सिर्फ वो हैं जिनमें जीने की चाह नहीं होती" हमने अपने आस-पास न जाने कितनी महिलाओं को संघर्ष करते देखा है। रोजमर्रा की जिंदगी में उलझी हुई महिलाओं को पता ही नहीं चलता कि कब उनकी सुबह शाम में ढ़ल गई और कब रात से सुबह हो गई। घड़ी की सुईयों की तरह हर पल वे अपने काम में निरत रहती हैं। उनका काम भी कितना अजीब है ना। खुद के लिए नहीं बल्कि अपने परिवार के लिए। परिवार ,  जिसे वे अपने आप से ज्यादा अहमियत देती हैं। सुबह उठो ,  बच्चों को उठाओं ,  तैयार करवाओ ,  स्कूल भेजो। फिर घर के अन्य सदस्यों के लिए नाश्ता चाय और लंच की तैयारी करों। सुबह से हो गई दोपहर। अभी थोड़ी देर बैठने का मन हुआ ही कि बच्चों के स्कूल से आने का टाइम हो गया। जल्दी-जल्दी उन्हें लेने के लिए बस स्टॉप जाओ।   घर आकर उन्हें खाना खिलाई। होमवर्क कराई , फिर ट्यूशन ले कर जाओं। ट्यूशन हो गया तो डांस क्लास या फिर अन्य किसी गतिविधि के क्लास में लेकर जाओ। पता ही नहीं च...

शुद्ध आबो-हवा के लिए हरियाली जरूरी

हरियाली और पर्यावरण के बीच चोली-दामन का संबंध है। राष्ट्रीय राजधानी में घटती हरियाली जलवायु पर असर डालती है। मौसम विज्ञान विभाग की ओर से राज्यों की जलवायु परिवर्तन पर पिछले दिनों जारी की गई एक रिपोर्ट इसकी तस्दीक करती है। एक समय ऊंचाई से देखने पर दिल्ली का बड़ा इलाका बगीचे की तरह नजर आता था। हालांकि, सड़क किनारे करीने से लगे पेड़ और रिज क्षेत्र दिल्ली की खूबसूरती को अब भी बरकरार रखे हुए है। यहां की हरियाली ही थी, जिसने मुगलों को अपनी तरफ आकर्षित कर लिया था। अंग्रेजों ने भी यहां की आबो-हवा को अपने अनुकूल पाया और कोलकाता से दिल्ली राजधानी लेकर आ गए। अब स्थिति बदल गई है। आबादी के बोझ से दिल्ली महानगर बेदम है। हालत यह है कि प्रत्येक साल करीब पांच लाख लोग रोजगार की तलाश में यहां आते हैं। फिर यहीं के होकर रह जाते हैं। हालांकि, यह रिवाज पुराना है। पिछले कई दशकों से रोजगार और शिक्षा की तलाश में लोग यहां आ रहे हैं। इनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए दिल्ली महानगर के संसाधनों का अतिरिक्त दोहन किया जा रहा है। महानगर में जो बुनियादी ढांचे विकसित किए जा रहे हैं, उसमें दिल्ली के पेड़ों...

सिर्फ पैसा बनाने का धंधा

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दिल्ली में कामकाजी महिलाओं और छात्राओं का हॉस्टल (पीजी) आज एक व्यवसाय का रूप ले चुका है। लेकिन इन हॉस्टलों में ना तो पर्याप्त सुविधा है, ना कोई सुरक्षा का इंतजाम। विडंबना यह है कि इन हॉस्टलों को लेकर शासन-प्रशासन ने भी दिशा-निर्देश अब तक नहीं बनाए हैं। “पीजी में रहने में तो बहुत दिक्कतें आती हैं। एक कमरे में जब दो-तीन लड़कियां रहती हैं तो कई मामलों में समझौता करना ही पड़ता है। यहां हमारा अपना घर जो नहीं है।” सत्या यह कहते हुए एक फीकी-सी मुस्कान बिखेरती हैं। वो गोरखपुर की रहने वाली हैं और दिल्ली में एक निजी कंपनी में नौकरी करती हैं। वो बताती हैं कि दिल्ली में नौकरी मिलने से वो काफी उत्साहित थी। लेकिन साथ-साथ उन्हें अपने रहने के लिए ठिकाने की भी तलाश थी। किराए पर मकान लेना उनके बजट से बाहर था इसलिए कुछ पहचान वालों और मित्रों के कहने पर वो लक्ष्मी नगर में एक पीजी में रहने लगी। कुछ ऐसी ही कहानी बिहार के चंपारण जिले से यूपीएसी की तैयारी करने आई शिल्पा भी सुनाती हैं। वे साल 2013 में दिल्ली आईं थी। पहले तो उन्होंने मुखर्जी नगर में कई कमरे तलाशे पर बजट में कोई ढंग का कमरा नहीं ...

नई सरकार का इंतजार

चुनाव के दैरान इक्का-दुक्का धरना-प्रदर्शनों को छोड़ दें तो जंतर-मंतर पर इस पखवाड़े सन्नाटा ही पसरा हुआ था। ऐसा लग रहा था मानो जंतर-मंतर को भी नई सरकार का इंतजार हो। इस पखवाड़े के शुरुआती दिनों में जंतर-मंतर पर घूमते हुए लगा कि यह वास्तविक जंतर-मंतर नहीं है। क्योंकि जंतर-मंतर ध्ारना-प्रदर्शन के लिए जाना जाता है। और इन दिनों यहां कोई धरना-प्रदर्शन नहीं हो रहा है। कहीं कोई अपने हाथ में माइक ले कर अपने अधिकारों की बात नहीं कर रहा है। कई महीनों से यहां डेरा डाले इक्का-दुक्का लोगों को छोड़ दें तो जंतर-मंतर पर पूरी तरह सन्नाटा फैला हुआ था। जंतर-मंतर पुलिस चौकी में बैठे दिल्ली पुलिस के सिपाही भी सुस्ता रहे थे। पूछने पर एक सिपाही ने बताया कि आम चुनाव हो रहे हैं इसलिए यहां धरना-प्रदर्शन नहीं हो रहा है। लोगों का मानना है कि चुनाव की वजह से केंद्र सरकार हमारी बातें सुनने और निर्णय करने की स्थिति में नहीं है। बहरहाल, इस बार जंतर-मंतर पर एक दिन एक अलग माहौल देखने को मिला। यह माहौल खुशी और जश्न का था। आम तौर पर यहां सताए हुए लोग अपनी फरियाद ले कर आते हैं। परंतु बीते 19 अप्रैल की शाम यह...